Sunday, September 24, 2017
ओपिनियन

चिंता से चतुराई घटे

आशीष आदर्श,  कैरियर काउंसेलर 
बचपन से हम बड़े-बूढ़ों से सुनते आये हैं कि चिंता से चतुराई घटती है. सच कहें, तो किसी समस्या से घिर जाने पर हमारा ध्यान समस्या की तरफ ही जाता है, समाधान की तरफ नहीं. एक प्रसंग से इस बात को और अधिक स्पष्ट करना चाहता हूं.
 
 किसी गांव में एक जमींदार रहा करता था. जमींदार का पूरे गांव में बड़ा दबदबा था. यहां तक कि जब गांव वालों को कोई समस्या होती, तो वे जमींदार के पास समाधान के लिए जाते. गांव वाले भी उसके फैसले को सर-आंखों पर लेते, क्योंकि उस जमींदार के बारे में एक बात मशहूर थी कि वह अपने बच्चे की गलती पर भी वही सजा सुनाता, जो किसी और को.
 
 जमींदार थोड़ा क्रूर स्वभाव का भी था. उसने एक दर्जन खूंखार कुत्ते पाल रखे थे और जब भी कोई अपराध करता, तो वह उन कुत्तों को उस पर छोड़ देता और कुत्ते उसे नोंच कर मार डालते. जमींदार का एक खास सेवक था. एक दिन उस सेवक से कोई गलती हो गयी. मामला जमींदार की अदालत में पहुंचा. जमींदार ने तय किया कि खूंखार कुत्ते सेवक पर छोड़ दिया जायें.
 
सेवक अवाक रह गया और बोला, हुजूर मैंने पिछले 30 साल से आपकी सेवा की है और आपके हर सुख-दुख का ख्याल रखा है, केवल एक बार मुझे माफ कर दीजिये. जमींदार ने अपने वसूल का वास्ता दिया. सेवक ने फिर गुहार लगायी, ठीक है हुजूर, अगर आपका यही फैसला है, तो मुझे मंजूर है, लेकिन कृपया यह सजा मुझे 10 दिन के बाद दी जाये. जमींदार यह मान गया और 10 दिन के बाद उसे सजा देने को तैयार हुआ. 
 
सेवक घर में मायूस बैठा था, तभी पत्नी ने उसे कहा कि इस तरह बैठने से काम नहीं चलेगा, कुछ उपाय निकालो. अगले दिन सेवक उन कुत्तों के प्रशिक्षक के पास गया और उसे 10 दिन तक कुत्तों के साथ रहने और उनकी सेवा करने की इजाजत मांगी. प्रशिक्षक तैयार हो गया. सेवक ने कुत्तों की खूब सेवा की, उनके साथ खेला, उनको समय पर भोजन दिया. धीरे-धीरे 10 दिन गुजर गये. नियत समय पर सेवक को लाया गया. कुत्तों को उस पर छोड़ा गया. लेकिन कुत्ते उसे काटने के बजाये, उसे जाकर चाटने लगे. 
 
जमींदार को आश्चर्य हुआ. उसने इसका कारण जानना चाहा. सेवक ने कहा कि उसने 10 दिन तक कुत्तों की सेवा की और आज कुत्ते उसे काटने के बजाय प्यार करने लगे. अब जमींदार को अपनी गलती का एहसास हुआ कि जिस व्यक्ति ने 30 साल तक मेरी सेवा की, मैं उससे कितना क्रूर हो गया और यह जानवर महज 10 दिन में ही इसका मित्र बन गया. उस दिन से जमींदार ने अपना तरीका बदल दिया और उस सेवक को भी माफ कर दिया.            
 
 जब हम किसी परेशानी में होते हैं, तो हमारा पूरा ध्यान आनेवाले खतरे और खौफ पर केंद्रित हो जाता है और इससे हम अपनी सूझ-बूझ खो देते हैं. लेकिन, यदि हम उस सेवक की तरह खतरे के डर को दरकिनार कर उससे बाहर निकलने के विकल्पों पर काम करें, तो बहुत संभावना है कि हमें कोई-न-कोई रास्ता अवश्य नजर आ जायेगा.