Saturday, October 21, 2017
ओपिनियन

मन का न हो तो और भी अच्छा

मन का न हो तो और भी अच्छा
अक्सर हमें स्वयं से और दुनिया से बहुत शिकायत रहती है कि हमें जीवन में यह नहीं मिला, वह नहीं मिला, ये मेरे मन का नहीं हुआ. अगर ऐसा होता, तो ठीक होता, अगर ऐसा नहीं होता, तो अच्छा नहीं होता. कहने का तात्पर्य है कि हम जीवन को अपने हिसाब से चलते हुए देखना चाहते हैं.

क्या हमने कभी यह सोचा कि यदि हर व्यक्ति के मन का होने लगे, तो पूरा दुनिया कहां चली जायेगी? संभव है कि आप किसी बात को लेकर ऐसा चाहते हों कि यह काम ऐसे होना चाहिए और दूसरा उसी काम को किसी और तरीके से होता हुआ देखना चाहता हो. ऐसे में कैसे संभव है कि दोनों के मन का हो? तो क्या करना चाहिए. ऐसी स्थिति में जिससे किसी भी परिस्थिति में मन पर बोझ या तनाव न पड़े? आइये, इसका समाधान एक सच्ची कहानी से निकालने की कोशिश करते हैं.
 
वर्षों पहले की बात है. नैनीताल के एक बोर्डिंग स्कूल में सैकड़ों बच्चे पढ़ा करते थे. छात्रों के लिए अलग-अलग क्लब बने हुए थे. कुछ बच्चे गाना-बजाना पसंद करते थे, तो उनके लिए म्यूजिक क्लब था. गणित वाले छात्रों के लिए मैथ्स क्लब, फुटबाल के लिए स्पोर्ट्स क्लब आदि थे. उस स्कूल में एक ड्रामा क्लब भी था. अक्सर स्कूल के विभिन्न समारोह में ड्रामा और संगीत के कार्यक्रम हुआ करते थे. उस स्कूल में ड्रामा में विशेष रुचि रखनेवाला एक लड़का था, जो स्कूल के लगभग सभी कार्यक्रमों में अपने अभिनय कला से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता. तभी स्कूल में वार्षिक उत्सव की तिथि को घोषणा हुई.

हर बार की तरह इस बार भी एक बढ़ियां ड्रामा भी प्लान किया गया, जिसका मुख्य किरदार उसी लड़के को निभाना था. पूरा ग्रुप ड्रामा की तैयारियों में जुट गया और उसमे भाग लेनेवाला हरेक छात्र भरपूर मेहनत से अपने किरदार को और सशक्त बनाने में जुट गया. अचानक उस मुख्य किरदार निभानेवाले लड़के को बुखार हो गया. दवा लेने पर भी जब उसका बुखार कम नहीं हुआ, तो प्रिंसिपल ने उसे स्कूल के अस्पताल में भरती होने का आदेश दे दिया. भूमिका को निभाने का जिम्मा किसी अन्य लड़के को दे दिया गया. यह सब देख कर उस लड़के की आंखों में आंसू आ गये, वह घोर निराशा में डूब गया. कार्यक्रम में बच्चों के अभिभावक भी आमंत्रित थे. ड्रामा शुरू हो गया और उस लड़के के कान में वह सभी डायलॉग्स पड़ रहे थे, जिसके लिए उसने दिन-रात एक कर दिये थे. अब उस लड़के की सब्र का बांध टूट बड़ा और वह फफक-फफक कर रोने लगा. तभी उसकी नजर दरवाजे पर पड़ी. वहां उसके पिता खड़े थे.

उन्होंने बेटे के कंधे पर हाथ रख कर कहा- देखो बेटा, तुमको इसके लिए दुखी होने की जरूरत नहीं है. याद रखो, तुम्हारे मन का हो तो अच्छा, और तुम्हारे मन का न हो तो और भी अच्छा. जब तुम्हारे मन का नहीं होता, तो वह ईश्वर के मन का होता है और ईश्वर कभी भी तुम्हारा बुरा नहीं चाह सकता. पिता की बात सुन कर उस लड़के की आंखों में चमक आ गयी, मानो उसे जीवन को देखने का एक नया नजरिया मिल गया हो. उसके बाद, उस लड़के ने अभिनय के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. उस लड़के का नाम था- अमिताभ बच्चन और उस महान पिता का नाम था- हरिवंश राय बच्चन.

नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था, जीवन में जो भी घटित होता है उसे होने दें, अन्यथा हम एक ऐसी लड़ाई के हिस्सा बन जायेंगे, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं. यदि हम इस तथ्य को समझ सकें, तो हमें पीछे मुड़ कर देखने की आवश्यकता नहीं होगी.
 
 
आशीष आदर्श
कैरियर काउंसेलर 
aaashish500@gmail.com