Monday, May 29, 2017
ओपिनियन

ज्ञान व सद्भाव शब्दों में नहीं कार्यों में होना चाहिए

आशीष आदर्श
कैरियर काउंसेलर 
आज का कॉलम प्रारंभ करने से पहले मैं आपसे एक कहानी साझा करना चाहूंगा, जो हमें इस विषय के और करीब लेकर जायेगी. किसी शहर में एक सेठ जी परिवार के साथ रहा करते थे. परिवार में उनकी पत्नी और लगभग 20 वर्ष का एक बेटा भी था. एक दिन अचानक बेटे ने कहीं बोलता हुआ तोता देख लिया और फिर बाजार से जाकर एक तोता खरीद लाया. सेठ जी को यह पसंद नहीं था कि किसी जीव को कैद कर उनके घर में रखा जाये.
 
उन्होंने अपने बेटे से कहा- देखो पुत्र, मैं समझता हूं कि परतंत्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप और दंड है, तुम इस पाप के भागी क्यों बनते हो. बेहतर होगा कि तुम इस तोते को आजाद कर दो और अपनी तरह इसे भी स्वच्छंद विचरण करने दो. लेकिन, बेटे ने तोते को घर में रखने की जिद कर ली और अपने पिता से विवाद करने लगा. पिता यह सब देख कर चुप हो गये और तोते को आजाद करने की कोई और युक्ति सोचने लगे. फिर वे अपने बेटे की अनुपस्थिति में उस तोते को एक वाक्य सिखाने लगे- ‘पिंजरा खुला है, जल्दी से यहां से भाग जाओ और आजाद हो जाओ.’
 
कुछ ही दिनों में तोते ने यह वाक्य सीख लिया और अब वह अक्सर यह बोलता रहता- ‘पिंजरा खुला है, जल्दी से यहां से भाग जाओ और आजाद हो जाओ.’ कुछ दिनों के बाद सेठजी ने एक दिन पिंजरे का दरवाजा खोल दिया. तोता पिंजरे से बाहर निकला और चारों तरफ आंगन में यहां-वहां घूमने लगा. घूमते हुए वह लगातार यही बात दोहराता रहा कि ‘पिंजरा खुला है, जल्दी से यहां से भाग जाओ और आजाद हो जाओ.’ थोड़ी देर में तोते ने सेठजी के बेटे को आते हुए देखा. यह देखते ही वह वापस पिंजरे में चला गया, लेकिन मजे की बात यह है कि अब भी वह उसी वाक्य को दोहरा रहा था. उसके बाद तोता ऐसा ही करने लगा. जब भी उसे पिंजरे का दरवाजा खुला मिलता, वह पूरे आंगन में यहां-वहां घूमता रहता और फिर, किसी को आते देख वापस पिंजरे में घुस जाता और लगातार उसी वाक्य को बोलता रहता. सेठजी ने यह सब देख कर सोचा, कितना मूर्ख है यह तोता, यह जो बात बोल रहा है, यदि उसका अर्थ समझ लेता, तो कब का इस कैद से आजाद हो चुका होता.
 
दोस्तों, हमारे जीवन की भी यही कहानी है. हम हर दिन ज्ञान और सद्भाव की बड़ी-बड़ी बातें सीखते हैं और रोजाना वे बातें हमारे सामने से कई बार गुजरती हैं. हम वह सब उसी पिंजरे के तोते की तरह बोलते और सुनते रहते हैं, लेकिन उसका कोई असर हमारे वास्तविक जीवन और कार्य पर होता नहीं दिखाई देता, जिस कारण हम हमेशा दुख, अवसाद और क्रोध के पिंजरे में कैद पड़े रहते हैं. 
 
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि सच और झूठ या पाप और पुण्य में क्या फर्क है, लेकिन वे हमारे लिए केवल शब्द रहे और उनका मतलब समझना, हमने जरूरी नहीं समझा. बाद में यही नासमझी हमारे सभी दुखों का कारण बनी, लेकिन हमने हमेशा इसके लिए ईश्वर और भाग्य को दोष दिया. अभी भी समय है. यदि हम उमंग और उल्लास से विशाल वातावरण में उड़ना चाहते हैं, तो हमें अपने जीवन के शब्दों के अर्थ को मन से समझना होगा. यदि हम सचमुच ऐसा कर सके, तो हमारा जीवन निश्चित रूप से दूसरों के लिए एक प्रेरणा बनेगा, इसमें कोई संदेह नहीं.