Wednesday, July 26, 2017
ओपिनियन

नकारात्मक बातों से दूरी बना कर चलें

नकारात्मक बातों से दूरी बना कर चलें
आशीष आदर्श
कैरियर काउंसेलर 
हम अक्सर देखते हैं कि ऑफिस हो या घर, हमें विचलित करनेवाला नकारात्मक माहौल हमारे आस-पास ही बनता रहता है. ऑफिस में हमारे सीनियर ने हमें काबिल समझ कर कोई महत्वपूर्ण काम दिया. इस पर हमारे बगल की सीटवाले वर्माजी ताना मारते हुए कहते हैं, क्यों भई, बड़े नजदीक हो बॉस के! ये काम ठीक से कर तो लोगे न? वर्माजी की बातों में प्रोत्साहन कम और प्रतियोगिता की भावना ज्यादा है, जो एक बारगी किसी के भी आत्मविश्वास को डिगा दे. 
 
हम ऑफिस से निकले अपने सेल्स टारगेट को पूरा करने, तभी हमारा सहकर्मी कहता है, आज अगर टारगेट पूरा नहीं किये, तो तुम इस कंपनी से अपनी छुट्टी समझो. कहने की आवश्यकता नहीं कि सहकर्मी के कथन में शुभकामनाओं का कम और ईर्ष्या का भाव ज्यादा था. मन में इस नकारात्मक टिप्पणी से डर  पैदा हो जाता है. कई बार इस प्रकार की टिप्पणियां हमारे ऊपर ऐसा असर करती हैं कि हम अपनी क्षमता के अनुरूप साधारण कार्य को भी अंजाम नहीं दे पाते. तो क्या करें और कैसे बचें इन सबसे? आइये इसका समाधान एक कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं.  
 
किसी देश में एक जंगल था, जंगल के पास एक ऊंचा पहाड़ भी था. एक बार जंगल के सभी जानवरों ने मिल कर एक प्रतियोगिता कराने की योजना बनायी. प्रतियोगिता में सभी जानवर भाग ले सकते थे, जिसमें  सभी को उस पहाड़ की चोटी पर पहुंचना था. चोटी पर सबसे पहले पहुंचनेवाले जानवर को पुरस्कार दिया जाना तय हुआ. तय दिन के अनुसार सभी जानवर तय स्थान पर एकत्र हुए.
 
प्रतियोगिता में शेर, बंदर, जिराफ, हाथी, लोमड़ी इत्यादि सभी प्रकार के जानवर तो थे ही, मेंढकों के एक झुंड ने भी भाग लिया. प्रतियोगिता शुरू हुई. अभी कुछ ही देर हुआ था कि जानवरों के एक झुंड से आवाज आयी, ‘अरे देखो इन मेंढकों को, ये भी हमारी बराबरी कर रहे हैं, थोड़ी देर फुदकने पर ही इनकी जान निकल जायेगी, ये ऊपर क्या चढ़ेंगे?’ यह बात सुन कर जानवरों ने मेंढकों की तरफ देखा और जोर का ठहाका लगाया. अभी सभी कुछ ही दूर चले थे, एक जानवर बोला, ‘हे भगवान, पहाड़ तो बहुत ऊंचा है. 
 
चढ़ना मुश्किल है. कैसे हम चोटी पर पहुंचेंगे?’ कई जानवर ने उसकी बातों में हां में हां मिलायी और वहीं रुक गये. लेकिन अभी भी बहुत से जानवर चल रहे थे. कुछ समय बाद फिर आवाज आयी, ‘मेरा तो पैर दर्द कर रहा है. कहीं मैं थक कर बेहोश न हो जाऊं! बेकार है जाना.’ यह बात सुन कर कई अन्य जानवरों ने वहीं से वापस लौटने का निर्णय लिया. लेकिन अभी भी कुछ जानवर आगे बढ़ रहे थे. थोड़ी देर बाद फिर आवाज आयी, ‘इतनी ऊंची चोटी पर चढ़ पाना हमारे बस की बात नहीं. 
 
हम कोई पर्वतारोही तो हैं नहीं!’ साथ चल रहे कई जानवरों को यह बात सही लगी और उन्होंने भी वापस लौटने का फैसला किया. अब कुछ जानवर और कुछ मेंढक चल रहे थे. समय गुजरता गया, जानवर कम होते गये. अंत में, उस चोटी पर केवल एक मेंढक फुदक-फुदक कर पहुंच सका. यह जानकर अन्य जानवरों को बड़ी शर्मिंदगी हुई. उन्होंने उसी झुंड के एक मेंढक से पूछा, ‘यार, एक बात बताओ, तुम्हारा दोस्त चोटी पर कैसे पहुंच गया?’ मेंढक ने मुस्कराते हुए कहा, ‘भाई, वह इसलिए चोटी पर पहुंचा, क्योंकि वह बहरा है. 
 
सुन नहीं सकता. इसलिए तुम्हारी कोई भी नकारात्मक बात उसके कान तक नहीं पहुंची.’ यह बात सुन कर तमाम जानवर स्तब्ध रह गये. किसी महान विचारक ने कहा है, ‘यदि आपमें नकारात्मकता है, तो आप हर अवसर में मुश्किल देखेंगे. यदि आपमें सकारात्मकता है, तो आप हर मुश्किल में अवसर देखेंगे.’ इसलिए, अब हमें तय करना है कि क्या हम नकारात्मकता के माहौल में उस मेंढक की तरह बहरे बन सकते हैं? यदि हां, तो हमें अपने उद्देश्य की चोटी पर पहुंचने से कोई ताकत नहीं रोक सकती.